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Search_of_life :-एकतरफा तंत्र: ऑनलाइन गेमिंग और सट्टेबाजी की 'नीति-नियत' की त्रासदी

Search_of_life :-एकतरफा तंत्र: ऑनलाइन गेमिंग और सट्टेबाजी की 'नीति-नियत' की त्रासदी
​"नीति और नियत के बीच पिसता भविष्य: ऑनलाइन सट्टेबाजी का चक्रव्यूह।"

अतिरिक्त आय की चिन्ता, उफ़! उस पर नीतिगत विरोधाभास: क्या करें संपूर्ण तंत्र आकाश?

"आज की इस विडंबना को मैं इन कुंडलिया छंद की पंक्तियों के माध्यम से देखता हूँ, जो वर्तमान नीति-नियत की त्रासदी को उजागर करती हैं:

मानव चिन्तन सब करे,होय कमाई अधिक।
फेम ऑनलाइन गेम ,देता आय सटीक ।
देता आय सटीक,हुआ मालामाल तंत्र ।
खेलो करना बंद। केवल यह जपता मंत्र।
सट्टा जब अपराध। पूर्ण हो तब प्रतिबंधन।
खाता क्यों हो 'होल्ड'! कर ता मानव चिन्तन ।

    ---‌search of life 


कुण्डलिया भावार्थ:- मानव सदैव यही चिन्तन करता है कि उसकी आय अधिक हो। यदि वह बहुत अमीर होने का न भी सोचे, तो कम से कम गरिमापूर्ण जीवन जीने भर की आय की लालसा तो उसे रहती ही है। आज के दौर में उसकी इसी इच्छा और विवशता का लाभ ये ऑनलाइन गेम्स उठा रहे हैं। विडंबना देखिए, इन खेलों से केवल खिलाड़ी ही नहीं, बल्कि संपूर्ण तंत्र भी कहीं न कहीं प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से लाभान्वित होकर मालामाल हो रहा है।

​फिर भी, एक विरोधाभास चहुँओर गुँजायमान रहता है—"ऑनलाइन खेल बंद करो!" सत्य तो यह है कि सट्टेबाजी, जिसे सम्मानित भाषा में 'द्युत' और लोकभाषा में 'जुआ' कहा जाता है, उससे आज तक किसी का भला नहीं हुआ। यह क्षणिक सुख तो देता है, पर वह कस्तूरी मृग की उस सुगंध की तरह है जिसका पीछा करते-करते जीवन बीत जाता है पर हाथ कुछ नहीं आता।

​परंतु प्रश्न वही है कि 'पकड़ी तो नाक ही जाएगी'। जब यह पूर्णतः अपराध है, तो इस पर पूर्ण प्रतिबंध क्यों नहीं? क्या यह 'हाथी के दाँत खाने के और, दिखाने के और' वाली नीति नहीं है? जैसे सिगरेट के पैकेट पर लिखा होता है—"स्मोकिंग इज इन्जूरियस टू हेल्थ", पर सवाल वही कि—"सिगरेट भईया मिलऊ कैसे जायो?" (अर्थात जब जहर है, तो दुकान पर उपलब्ध ही क्यों है?)

​इसी तरह, युवाओं को सीख देने के नाम पर उनका "खाता होल्ड" कर देना और दूसरी तरफ सट्टेबाजी के विज्ञापनों को छूट देना—"ई बात कहवाँ हजम होईहैं भला!" यह तंत्र की दोहरी नीति नहीं तो और क्या है?


कुण्डलिया  में  आए कुछ कठिन शब्दों के  अर्थ व मात्राभार  तालिका 

श्रेणीविवरण / विश्लेषण
कठिन शब्दार्थ ($schema$)

द्युत: जुआ या सट्टेबाजी।


कस्तूरी मृग: भटकाव और भ्रम का प्रतीक।


परिमार्जन: शुद्ध करना या सुधारना।


चहुँओर: चारों दिशाओं में।


लालसा: तीव्र इच्छा।

मात्राभार: प्रथम चरण

मानव चिन्तन सब करे


२+१+१+२ +१+१ + १ + १+१+२ = १३ मात्राएं

मात्राभार: द्वितीय चरण



२+१+ १+२+२ + १+१+१+ = ११ मात्राएं

कुल योग१३ + ११ = २४ मात्राएं (कुण्डलिया का मानक नियम)



१. विज्ञापन के भँवरजाल और वैधानिक चेतावनी का सच

सिगरेट के पैकेट पर वीभत्स (भयंकर) छवि चिपकाकर उसे 'स्वर्णपात्र' (Goldflake) जैसे आकर्षक साँचों में ढालना और ऊपर से लिख देना—"Cigarette smoking is injurious to health"। वाह! यह तो वही बात हुई कि जहर भी बेच रहे हैं और चेतावनी भी दे रहे हैं। फिर सिने-सितारों से "बोलो जुबाँ केसरी" कहलवाना और फिल्मों में सट्टेबाजी वाली साइटों (1x, Rajbet, Bob777) का भ्रामक प्रचार कराना—यह सब क्या है?

Playstore पर ऑनलाइन  रमी गेम्स को जगह देना और लूडो-विन्जो जैसे प्लेटफॉर्म्स का बड़े खिलाड़ियों से प्रचार करवाकर अंत में दबे स्वर में कह देना कि "इसमें वित्तीय जोखिम शामिल है, संभलकर खेलें"—यह तो बिल्कुल वैसा ही है जैसा ट्रकों के पीछे लिखा होता है: "देखो मगर प्यार से!" जब तंत्र का पूरा समर्थन इन विज्ञापनों और राजस्व (Revenue) को है, तो फिर गाज केवल आम जनमानस पर ही क्यों गिरती है? उनके खातों पर ही 'होल्ड' काहे भईयवा?😂


In English  essence 

The Reality of Deceptive Ads and Hollow Warnings

  • The Packaging Trap: It is the height of irony to print gruesome images on cigarette packs while branding them with names like 'Goldflake' (Golden Vessel). Selling poison wrapped in gold, then adding a tiny warning—"Smoking is injurious to health"—is nothing but a mockery of the common man.

  • The Celebrity Facade: On one hand, superstars urge the masses to "Bolo Zubaan Kesari," and on the other, major events are sponsored by shady betting platforms like 1x and Rajbet.

  • The 'Play Store' Paradox: While these platforms are given official space, they use sports icons to lure people into apps like Ludo and Winzo. Adding a disclaimer like "Includes financial risk, play responsibly" is just like that cheeky truck slogan: "Dekho Magar Pyaar Se" (Look, but with love).

  • The Final Question: If the system itself provides the stage, the actors, and the script for this 'gambling,' then why punish only the common man? If this is not state-sponsored support, then why is the 'hold' only on our accounts, brother? 😂

बुलेट ट्रेन की रफ़्तार से आते लुभावने सपने

आकाशवाणी पर प्रसारित होने वाले उन विज्ञापनों का वह दौर याद है? जहाँ सावधानी के तौर पर कहा जाता था—"यदि कम उम्र में विवाह किया, तो संतान विकलांग हो सकती है या माँ की जान को खतरा हो सकता है"। लेकिन आज का दौर तो बिल्कुल ही उलट गया है। आज विज्ञापनों की दुनिया में करोड़पति बनाने वाली बुलेट ट्रेन दौड़ रही है।


अदाकाराओं और नामी कलाकारों द्वारा बड़े-बड़े होर्डिंग्स और मोबाइल स्क्रीन पर करोड़ों के इनाम दिखाए जाते हैं। वे बड़े गर्व से कहते हैं कि उन्होंने करोड़ों जीत लिए! सत्य तो यह है कि आप करोड़पति बनें न बनें, वे अवश्य बन जाते हैं। क्या यह विडंबना नहीं है कि लूडो और विन्जो जैसे खेलों के विज्ञापनों में मात्र ₹10 का दाँव लगाकर लाखों-करोड़ों के सपने बेचे जा रहे हैं? हज़ारों रुपए हारने के बाद भी वही लुभावना भँवरजाल फिर सामने आता है। यह कैसी व्यवस्था है, जहाँ एक ओर हम 'वित्तीय जोखिम' की चेतावनी देते हैं और दूसरी ओर उसी जोखिम के 'बुलेट ट्रेन' जैसे विज्ञापन घर-घर पहुँचाते हैं ।

In English  essence: -

The Bullet Train of False Dreams

Do you remember the era of radio ads that warned us about the dangers of early marriage for the sake of social health? Today, that caution has been replaced by a 'Bullet Train' of greed.

High-profile celebrities flash crores of rupees on billboards and screens, claiming to have won it all. The bitter truth is: whether you become a millionaire or not, they certainly do! It is a tragic irony that for a mere ₹10 bet, dreams of millions are auctioned. Even after losing thousands, the common man is lured back into the same whirlpool. This system sells the 'risk' as a 'reward' and then wonders why the public is suffering.

 धन पर 'होल्ड' और विसंगति

यह अत्यंत सोचनीय विषय है कि एक ओर इन प्लेटफॉर्म्स को 'जोखिमपूर्ण' बताकर इनके द्वारा अर्जित धन पर 'अवरोध' (Hold) लगाया जाता है, वहीं दूसरी ओर इन्हें सार्वजनिक रूप से प्रचार-प्रसार की खुली छूट दी जाती है। यदि प्रक्रिया संदिग्ध है, तो उसकी अनुमति ही क्यों? और यदि अनुमति है, तो अर्जित लाभ पर अवरोध क्यों?


३. शब्दार्थ तालिका (साहित्यिक शब्दावली)

कठिन शब्द अर्थ
द्वैध आचरण दोहरा व्यवहार (Double Standard)
दामोदर आर्थिक भार उठाने वाला
पल्लवित विकसित होना या फलना-फूलना
त्रासदी गंभीर दुःखद स्थिति

४.  दोहे 

"अमृत कलश बाहर वचन,अंतस विष विस्तार। 
 हाथी दंत समान यह,नृप का द्वैध विचार॥" 

भावार्थ: शासन की वाणी में जनकल्याण का अमृत है, किंतु नीतियों में विरोधाभास का कपट झलकता है। यह बिल्कुल हाथी के उन दांतों की तरह है जो केवल प्रदर्शन के लिए होते हैं।

"यह तंत्र की कैसी विडंबना है कि वह जहर भी बेचता है और चेतावनी भी देता है। व्यवस्था का यह दोहरा चरित्र (Hypocrisy) समाज के हर महत्वपूर्ण अंग में पैठ बना चुका है। सेवा और शोषण के इसी अंतद्वंद्व को हमने अपने पिछले आलेख [डॉक्टर: देव या दानव] में भी गहराई से उकेरा
"सट्टा चमकत पर्दहन, राज-बैट के संग।
जीते जो कोई यहाँ ,होल्ड खुशी हो भंग।।🙏

भावार्थ: विज्ञापनों और फिल्मों के पर्दों पर सट्टेबाजी के मंच गौरव के साथ चमकते हैं। विडंबना यह है कि जब कोई सामान्य जन इनसे कुछ अर्जित करता है, तब तंत्र उन पर रोक (Hold) लगाकर उनकी खुशी को भंग कर देता है।


५. निष्कर्ष: शुचिता की आवश्यकता

समाधान 'होल्ड' लगाने या कर (Tax) वसूलने में नहीं, बल्कि पूर्ण स्पष्टता में है। यदि कोई मार्ग विनाशकारी है, तो उसका नामोनिशान मिटना चाहिए। आधे-अधूरे प्रतिबंध और विज्ञापनों का मायाजाल केवल भ्रम पैदा करता है। साहित्य का उद्देश्य व्यवस्था को उसकी कमियों का दर्पण दिखाना है।

इस आलेख को पढ़कर  आप कहाँ  तक सहमत हैं, टिप्पणी पेटिका में अपनी आशीर्वादस्वरूपी प्रतिक्रिया अवश्य रखें।


यदि आप सामाजिक विसंगतियों और व्यवस्था के प्रहार पर आधारित ऐसी ही मर्मस्पर्शी रचनाएं पढ़ना चाहते हैं, तो हमारे नए काव्य-मंच 'कविताओं की यात्रा' पर यह चर्चित आलेख अवश्य पढ़ें: 👉 सवर्ण व्यथा: एक अनकही पीड़ा


कुछ महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर 

१. क्या केवल 'वैधानिक चेतावनी' लिख देने से सरकार अपनी नैतिक जिम्मेदारी से मुक्त हो जाती है?
उत्तर: कदापि नहीं। चेतावनी देना केवल कानूनी औपचारिकता है। वास्तविक जिम्मेदारी उस वस्तु की सुलभता और उसके भ्रामक प्रचार को रोकने में है। जब तंत्र स्वयं राजस्व (Tax) का लाभ उठाता है, तो उसकी नैतिक जिम्मेदारी और बढ़ जाती है।
२. 'जुबाँ केसरी' और 'वित्तीय जोखिम' वाले विज्ञापनों में क्या आपको विरोधाभास नहीं दिखता?
उत्तर: यह सबसे बड़ा विरोधाभास है। एक ओर ग्लैमराइज़्ड (चमक-धमक वाला) प्रचार है और दूसरी ओर दबे स्वर में चेतावनी। यह "अमृत कलश बाहर वचन, भीतर विष विस्तार" का साक्षात प्रमाण है।
३. क्या ऑनलाइन गेमिंग को 'स्किल' के नाम पर जुए (Betting) की छूट मिलनी चाहिए?
उत्तर: 'स्किल' का तर्क अक्सर एक आवरण (Cover) की तरह इस्तेमाल होता है। यदि परिणाम में आपकी मेहनत से ज्यादा 'दाँव' और 'किस्मत' की प्रधानता है, तो वह जुआ ही है और उसे वैसी ही सख्त नीतियों के दायरे में होना चाहिए।
४. जब प्लेटफॉर्म वैध हैं, तो जीतने वाले के खाते पर 'होल्ड' लगाना कहाँ तक न्यायोचित है?
उत्तर: यह सरासर अन्याय है। यदि खेल वैध है और सरकार कर (Tax) ले रही है, तो जनता की जीत भी वैध होनी चाहिए। 'होल्ड' लगाना यह दर्शाता है कि तंत्र केवल 'लेना' जानता है, 'देना' नहीं।
५. क्या बड़े सितारों द्वारा सट्टेबाजी वाले ऐप्स का प्रचार करना उनकी सामाजिक जिम्मेदारी का उल्लंघन है?
उत्तर: निश्चित रूप से। सितारे समाज के आदर्श होते हैं। जब वे चंद पैसों के लिए जोखिम भरे खेलों को 'सपना' बनाकर बेचते हैं, तो वे अपनी नैतिक जिम्मेदारी से विमुख हो जाते हैं।
६. 'हाथी के दाँत दिखाने के और, खाने के और'—क्या आज की नीतियाँ इसी मुहावरे पर आधारित हैं?
उत्तर: हाँ, जनता को 'विकास' और 'अवसर' के दाँत दिखाए जाते हैं, जबकि पर्दे के पीछे से राजस्व की 'चक्की' में आम आदमी की गाढ़ी कमाई को ही पीसा जाता है।
७. क्या युवा पीढ़ी को इस दलदल से निकालने के लिए केवल 'प्रतिबंध' काफी है?
उत्तर: केवल प्रतिबंध समाधान नहीं है। हमें 'बुलेट ट्रेन' वाली मानसिकता को बदलना होगा। युवाओं को यह समझाना होगा कि "मेहनत का कोई विकल्प नहीं होता" और रातों-रात करोड़पति बनने के सपने अक्सर 'खाकपति' बना देते हैं।
८. क्या राजस्व (Tax) कमाने के लिए सरकार जनमानस के स्वास्थ्य से समझौता कर रही है?
उत्तर: वर्तमान नीतियाँ तो यही संकेत देती हैं। राजस्व की भूख इतनी बढ़ गई है कि सिगरेट और जुए जैसी हानिकारक चीज़ों को भी 'बाजार' की आड़ में सुरक्षा मिल रही है।
९. सिगरेट और जुआ—क्या इनका खुलेआम मिलना एक बड़ी साजिश है?
उत्तर: यह व्यावसायिक लाभ और सरकारी राजस्व का एक ऐसा चक्रव्यूह है जिसमें आम आदमी केवल एक 'उपभोक्ता' बनकर रह गया है। चेतावनी केवल एक सुरक्षा कवच (Legal Shield) है, समाधान नहीं।
१०. आपके अनुसार, इस भँवरजाल का स्थाई समाधान क्या होना चाहिए?
उत्तर: समाधान 'स्पष्ट नीति' (Transparent Policy) में है। यदि हानिकारक है, तो विज्ञापन बंद हों। यदि वैध है, तो जनता के साथ 'होल्ड' वाला खेल बंद हो। और सबसे ऊपर, व्यक्ति की स्वयं की जागरूकता ही असली बचाव है।

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