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Search_of_life :-एकतरफा तंत्र: ऑनलाइन गेमिंग और सट्टेबाजी की 'नीति-नियत' की त्रासदी

​"नीति और नियत के बीच पिसता भविष्य: ऑनलाइन सट्टेबाजी का चक्रव्यूह।" अतिरिक्त आय की चिन्ता, उफ़! उस पर नीतिगत विरोधाभास: क्या करें संपूर्ण तंत्र आकाश? "आज की इस विडंबना को मैं इन कुंडलिया छंद की पंक्तियों के माध्यम से देखता हूँ, जो वर्तमान नीति-नियत की त्रासदी को उजागर करती हैं: मानव चिन्तन सब करे,होय कमाई अधिक। फेम ऑनलाइन गेम ,देता आय सटीक । देता आय सटीक,हुआ मालामाल तंत्र । खेलो करना बंद। केवल यह जपता मंत्र। सट्टा जब अपराध। पूर्ण हो तब प्रतिबंधन। खाता क्यों हो 'होल्ड'! कर ता मानव चिन्तन ।     ---‌search of life  कुण्डलिया भावार्थ :- मानव सदैव यही चिन्तन करता है कि उसकी आय अधिक हो। यदि वह बहुत अमीर होने का न भी सोचे, तो कम से कम गरिमापूर्ण जीवन जीने भर की आय की लालसा तो उसे रहती ही है। आज के दौर में उसकी इसी इच्छा और विवशता का लाभ ये ऑनलाइन गेम्स उठा रहे हैं। विडंबना देखिए, इन खेलों से केवल खिलाड़ी ही नहीं, बल्कि संपूर्ण तंत्र भी कहीं न कहीं प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से लाभान्वित होकर मालामाल हो रहा है। ​फिर भी, एक विरोधाभास चहुँओर गुँजायमान रहता है— "ऑनल...

महत्व कर्म का

  आदरणीय डॉ०ओमप्रकाश मिश्र'मधुव्रत'जी छंदशाला साहित्य संगम संस्थान ने हम नवांकुरों को अभ्यासार्थ एक नवीन छंद मृदंग_ध्वनि छंद दिया है जिसका विधान निम्नवत है:- बीज_मृदंग #जननी_पार्वती #जनक_शिव #रस_वीर_श्रृंगार_रौद्र_करुण *ध्वनि:-* धिमिं धिमिं धिमिं धिमिं मृदंगध्वनिरुद्गता। *लक्षण:-* जरौजतौतुराजभा मृदंगध्वनिरुच्यते । 121 212 121 2 21 212 जभान राजभा जभान ताराज राजभा #गण_सूत्र_जरजतर। 121 212 121 221 212 जभान राजभा जभान ताराज  महत्व कर्म का सदा इसे धर्म जानिए। विजीत जो यहाँ हुआ स्वेद भींगा मानिए।। कठोर साधना करें यहाँ लक्ष्य साधने। विकल्प अन्य ना यहाँ सुनें जीत नाधने।।

भारत-भारती के अवतारक: मैथिली शरण गुप्त

  भारत-भारती: क्रांतिवीरों की अमर गाथा भारत-भारती: माँ भारती के स्वतंत्रताकालीन पीड़ा का दर्शन "भारत-भारती" माँ भारती के स्वतंत्रताकालीन उस पीड़ा का दर्शन है जिसकी अवधारणा श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर स्वतंत्रता काल में रखी गई थी। इस महाकाव्य का हृदयस्पर्शी वर्णन आर्यजाति के उत्थान और पतन की गाथा से प्रारम्भ होता है। गुप्त जी ने इसमें अत्यंत विचारणीय पंक्तियाँ लिखी हैं, जहाँ वे उल्लेख करते हैं कि जंगली जातियाँ हमसे विकास की यात्रा में और अधिक आगे निकल गई हैं। भारत देश की तात्कालिक स्थिति का ऐसा अद्भुत वर्णन गुप्त जी ने किया है जिसे पढ़कर कोई भी भारतीयों की तात्कालिक स्थिति से परिचित हो सके। Udant martand:Hindi patrakarita ki shristhi साहित्य जगत के दिव्यतम नक्षत्र का अवतरण और उनकी साहित्य यात्रा 3 अगस्त 1886 को सेठ राम शरण गुप्त और काशी बाई गुप्त के आँगन में अवतरित इस दिव्यतम नक्षत्र ने बाल्यकाल से ही अपनी कुशाग्रता का परिचय दिया। उनकी प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा अपने गाँव चिरगाँव से ही हुई। हिंदी, संस्कृत और बांग्ला भाषा में विशेष रुचि ने उन्हें इन भाषाओं में सृजन कर हर दिल अ...