सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

Search of life । महँगाई पर हास्य व्यंग्य: सकपकवा लाल और मालिक-मलकान का बोलवचन ।

महँगाई  की उड़ान  और  सिसकती  जेब : सकपकवा  लाल  का संघर्ष   तो भैया! एक थे सकपकवा लाल—काम के कमिया कर्मचारी और दाम के फिसड्डी! उनका हाल इहे था कि उनकी जेब हमेशा सिसकती रहती थी। काहे कि महँगाई उनके जीवन का सारा ऑक्सीजन खींच ली थी और रही-सही कसर उनके मालिक-मलकान निकाल लेते थे। महँगाई की सकपकवा लाल जी से जानी दुश्मनी थी जैसे! वे जितना अधिक सकपकाते थे, महँगाई उन्हें उतना ही सकपकाती थी। ऐसा लगता था मानो सकपकवा लाल जी के मालिक-मलकान ने ही उसे आदेश दिया हो—"चाहे कुछ भी हो जाए, सकपकवा को एतना सकपकवाओ कि वह एकदम कन्फ्यूज़या जाए कि आखिर यह हो क्या रहा है!" ​साथ ही यह भी कह दिया हो—"यदि तुम ऐसा कर पाती हो तो तुम्हें हम और अधिक बढ़ावा देंगे, आखिर तुम्हारी बढ़ोतरी से फायदा तो हमारा ही है!" अब सकपकवा लाल करें तो क्या करें? मालिक-मलकान तो महँगाई से पहले ही हाथ मिला चुके थे!  जीवन बसंत की ९ कलियाँ और सम्मान का अचार जीवन बसंत के ९ ठो कलियन का ई संसथान में सुखाए देने वाले हमार भैया सकपकवालाल का लईकन का हिन्दी पढ़ावत-पढ़ावत कब हिन्दी प्रेम जागि गवा अउर उहौ अतीत के ...

Search of life । प्रसिद्धि: रिश्ते की 'प्राणवायु' [Formula: (प्रसिद्धि)^सामान्य जीव = रिश्तों का सैलाब]

प्राणवायु बनाम ऑक्सीजन: एक सामाजिक विरोधाभास मनुष्य एक अद्भुत जीव है, जो सांसें भले ही ऑक्सीजन से लेता हो, लेकिन जीता सिर्फ 'प्रसिद्धि' के सहारे है। उसे दिन-रात बस इसी बात का भय सताता रहता है कि कहीं उसके 'मान-सम्मान' को ज़रा सी खरोंच न आ जाए। जब तक आप एक साधारण और सामान्य इंसान हैं, यह संसार आपकी बातें सुनना तो दूर, आपकी ओर देखना तक अपनी तौहीन समझता है—चाहे आप समाज की भलाई में अपना सब कुछ ही क्यों न होम कर दें। ​जब तक आपके नाम के आगे कोई 'चमकता हुआ तमगा' नहीं है, तब तक आपके अपने निकटतम मित्र, भाई-बंधु और रिश्ते-नातेदार आपको रोज़ यह अहसास कराने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे कि इस धरती पर आपका जन्म शायद केवल वायुमंडल की ऑक्सीजन कम करने के लिए ही हुआ है! ​(प्रसिद्धि)^सामान्य जीव = रिश्तों का सैलाब | Search of life सामाजिक समीकरण‌ 1.0 ​ (सामान्य जीव) × (शून्य प्रसिद्धि) = पूर्ण उपेक्षा यहाँ तक कि जब आप किसी पारिवारिक समारोह में प्रवेश करते हैं, तो आपकी स्थिति उस 'मूक दर्शक' जैसी होती है, जिसे देखकर लोग बस यही सोचते हैं—"यह क्यों आया है?" ​लेकिन समाज क...

Search_of_life :-एकतरफा तंत्र: ऑनलाइन गेमिंग और सट्टेबाजी की 'नीति-नियत' की त्रासदी

​"नीति और नियत के बीच पिसता भविष्य: ऑनलाइन सट्टेबाजी का चक्रव्यूह।" अतिरिक्त आय की चिन्ता, उफ़! उस पर नीतिगत विरोधाभास: क्या करें संपूर्ण तंत्र आकाश? "आज की इस विडंबना को मैं इन कुंडलिया छंद की पंक्तियों के माध्यम से देखता हूँ, जो वर्तमान नीति-नियत की त्रासदी को उजागर करती हैं: मानव चिन्तन सब करे,होय कमाई अधिक। फेम ऑनलाइन गेम ,देता आय सटीक । देता आय सटीक,हुआ मालामाल तंत्र । खेलो करना बंद। केवल यह जपता मंत्र। सट्टा जब अपराध। पूर्ण हो तब प्रतिबंधन। खाता क्यों हो 'होल्ड'! कर ता मानव चिन्तन ।     ---‌search of life  कुण्डलिया भावार्थ :- मानव सदैव यही चिन्तन करता है कि उसकी आय अधिक हो। यदि वह बहुत अमीर होने का न भी सोचे, तो कम से कम गरिमापूर्ण जीवन जीने भर की आय की लालसा तो उसे रहती ही है। आज के दौर में उसकी इसी इच्छा और विवशता का लाभ ये ऑनलाइन गेम्स उठा रहे हैं। विडंबना देखिए, इन खेलों से केवल खिलाड़ी ही नहीं, बल्कि संपूर्ण तंत्र भी कहीं न कहीं प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से लाभान्वित होकर मालामाल हो रहा है। ​फिर भी, एक विरोधाभास चहुँओर गुँजायमान रहता है— "ऑनल...