महँगाई की उड़ान और सिसकती जेब : सकपकवा लाल का संघर्ष तो भैया! एक थे सकपकवा लाल—काम के कमिया कर्मचारी और दाम के फिसड्डी! उनका हाल इहे था कि उनकी जेब हमेशा सिसकती रहती थी। काहे कि महँगाई उनके जीवन का सारा ऑक्सीजन खींच ली थी और रही-सही कसर उनके मालिक-मलकान निकाल लेते थे। महँगाई की सकपकवा लाल जी से जानी दुश्मनी थी जैसे! वे जितना अधिक सकपकाते थे, महँगाई उन्हें उतना ही सकपकाती थी। ऐसा लगता था मानो सकपकवा लाल जी के मालिक-मलकान ने ही उसे आदेश दिया हो—"चाहे कुछ भी हो जाए, सकपकवा को एतना सकपकवाओ कि वह एकदम कन्फ्यूज़या जाए कि आखिर यह हो क्या रहा है!" साथ ही यह भी कह दिया हो—"यदि तुम ऐसा कर पाती हो तो तुम्हें हम और अधिक बढ़ावा देंगे, आखिर तुम्हारी बढ़ोतरी से फायदा तो हमारा ही है!" अब सकपकवा लाल करें तो क्या करें? मालिक-मलकान तो महँगाई से पहले ही हाथ मिला चुके थे! जीवन बसंत की ९ कलियाँ और सम्मान का अचार जीवन बसंत के ९ ठो कलियन का ई संसथान में सुखाए देने वाले हमार भैया सकपकवालाल का लईकन का हिन्दी पढ़ावत-पढ़ावत कब हिन्दी प्रेम जागि गवा अउर उहौ अतीत के ...