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Search of life । प्रसिद्धि: रिश्ते की 'प्राणवायु' [Formula: (प्रसिद्धि)^सामान्य जीव = रिश्तों का सैलाब]

प्राणवायु बनाम ऑक्सीजन: एक सामाजिक विरोधाभास

मनुष्य एक अद्भुत जीव है, जो सांसें भले ही ऑक्सीजन से लेता हो, लेकिन जीता सिर्फ 'प्रसिद्धि' के सहारे है। उसे दिन-रात बस इसी बात का भय सताता रहता है कि कहीं उसके 'मान-सम्मान' को ज़रा सी खरोंच न आ जाए। जब तक आप एक साधारण और सामान्य इंसान हैं, यह संसार आपकी बातें सुनना तो दूर, आपकी ओर देखना तक अपनी तौहीन समझता है—चाहे आप समाज की भलाई में अपना सब कुछ ही क्यों न होम कर दें।
​जब तक आपके नाम के आगे कोई 'चमकता हुआ तमगा' नहीं है, तब तक आपके अपने निकटतम मित्र, भाई-बंधु और रिश्ते-नातेदार आपको रोज़ यह अहसास कराने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे कि इस धरती पर आपका जन्म शायद केवल वायुमंडल की ऑक्सीजन कम करने के लिए ही हुआ है!

Prasiddhi Rishte Ki Pranvayu Satire Image
​(प्रसिद्धि)^सामान्य जीव = रिश्तों का सैलाब | Search of life

सामाजिक समीकरण‌ 1.0

(सामान्य जीव) × (शून्य प्रसिद्धि) = पूर्ण उपेक्षा

यहाँ तक कि जब आप किसी पारिवारिक समारोह में प्रवेश करते हैं, तो आपकी स्थिति उस 'मूक दर्शक' जैसी होती है, जिसे देखकर लोग बस यही सोचते हैं—"यह क्यों आया है?"
​लेकिन समाज का यह गणित स्थायी नहीं है। जैसे ही इस 'सामान्य जीव' पर 'प्रसिद्धि की घात (Power)' चढ़ती है, वैसे ही रिश्तों का सारा फ़िज़िक्स और कैमिस्ट्री रातों-रात बदल जाता है। ऑक्सीजन से सांस लेने वाला वही उपेक्षित प्राणी अचानक सबके लिए 'प्राणवायु' बन जाता है!


 सामाजिक समीकरण 2.0: घात का जादुई प्रभाव
​(प्रसिद्धि)^सामान्य जीव = रिश्तों का सैलाब

ई सामान्य मानव भैया जइसने विशिष्ट मानव बनता है—मतबल वही प्रसिद्धि पा लेता है, ठेठ भाषा में कहें तो उइका जैसने 'प्रसिद्धि के घात' चढ़ी जावे, तो उही पाँच टकया अगरबत्ती के खुशबू वाला जीव स्वर्ण चम्पा के खुशबू जइसन सुगंधित लगे लगता है! फिर तो न्यूटन बाबा के ग्रेविटेशनल फ़ोर्स (Gravitational Force) की तरह ही उइ जीव से लोगवा खिंचाइले चला आता है।

  •    नयनवा में बसाने की होड़

​  कल दूर बैठे वाला रिश्तेदार आज आपको नयनवा में, करेजवा में छुपाय लेवे चाहत हैं!

  • ​   वंशावली का ज्ञान

​जे पहिचाने नहीं चाहत था,उका आपकी पूरी वंशावली कंठस्थ होई जावत है।

सांख्यिकी का फेर: 'माँग और आपूर्ति' का सिद्धांत


किसी महान अर्थशास्त्री के बौराने से 'लॉ ऑफ डिमांड' (Law of Demand) का जन्म हुआ था। पहले तो हमरा उ पगला बुझाया था, पर जब उका सिद्धांत को समाज से जोड़े और ई प्रसिद्धि वाला गणित से मिलाए, तो उ बहुते भला आदमी बुझाया जी! गजबे सिद्धांत बनाया है।

​जब तक ई कठजीव (काहेकि बेचारा केतना कुछ सहके प्रसिद्धि पाता है) सामान्य रहता है, तब तक उका कोई मोल नहीं होता। पर जैसे ही प्रसिद्धि मिलती है, उ एकदम से रॉकेट जैसा कीमती हो जाता है!


फ़ॉर्मूला के भाषा में समझीं :

Higher the prices  ---> Lower the demand. 
Lower the prices ---> Higher the demand. 

मतबल जब व्यक्ति सामान्य था, तो कुकरो नहीं पूछता था (सस्ता माल की कोई कदर नहीं!)। पर प्रसिद्धि मिलते ही उ रॉकेट जैसा महँगा और दुर्लभ हो जावत है।

​काहेकि रॉकेटवा ऊपरे फूटता है न! सुतली बम जैसा नीचे थोड़े ही फूटता है!


पंगत से प्लेट तक: 'तारा' बनते ही थाली का बदलता भूगोल

सामने बैठने न देने वाला साथ में खाने को आग्रह करता है, मनुज जब तारा जैसन टमकता है!

सामाजिक समानता का सारा शास्त्र तब तक धरा का धरा रह जाता है, जब तक व्यक्ति 'आकाशगंगा का गुमनाम तारा' बना रहता है। पर जैसे ही प्रसिद्धि का प्रकाश फैलता है और मनुज 'तारा जैसन टमकने' लगता है, वैसे ही समाज के छुआछूत और दूरी के सारे अदृश्य फ़िल्टर अचानक गायब हो जाते हैं!

  • पंगत का प्रोटोकॉल :  कल तक जो 'श्रेष्ठ जन' आपको अपने बग़ल वाली कुर्सी तो दूर, ज़मीन की चटाई पर भी बैठने में हिचकते थे, वे आज आपकी थाली में जबरन काजू-बादाम परोसने के लिए उतावले रहते हैं।


  • भोजन नहीं, 'फोटो-ऑप' : अब आग्रह सिर्फ़ खाना खिलाने का नहीं होता, बल्कि एक हाथ में निवाला और दूसरे हाथ में मोबाइल लेकर सेल्फी खींचने का होता है, ताकि दुनिया को बताया जा सके— "देखें, तारा जी हमारे ही साथ ज़ियाफ़त फरमा रहे हैं!"

डिजिटल निष्ठा और 'स्टेटस' का गणित

आपकी प्रसिद्धि आपके प्रति हीन सोच रखने वाले को भी रातों-रात निष्ठावान बना देती है—

तो भईवा इहै न स्टारडम होवत है, बोले तो— पावर ऑफ फेमसो वाइटल सिन्ड्रोमानुप्रहारकवा!

कसम से, प्रसिद्धि मिलते ही मुफ़्त में 'ज़ेड सिक्योरिटी' मिल जाती है जी! कोई आपके ख़िलाफ़ कुछ बोल भर दे या आपके स्टेटस पर ज़रा भी लटपटाके टिप्पणी कर दे, तो यह 'लटजीरा' जैसा नया चाहने वाला कुनबा—जो कल तक अपशब्दों से आपका महिमामंडन करते नहीं थकता था—आपको बचाने में कोई कसर नहीं छोड़ता! और बचाने के बाद बड़े दुलार से कहता है— "अपने तो अपने ही होते हैं न जी! 

​जो कल तक आपको अपना मानता नहीं था और आपका नाम सुनना भी नहीं चाहता था, आज वो दिन-रात आपका नाम जपते नहीं थकता!

लाइक और शेयर का दनादन चौका-छक्का : 

जो कभी आपका स्टेटस हुलकवो नहीं करता था, वो अब सबसे पहले आकर "हमार बिटवा, हमार नुनवा, हमार लाल, हमार पीला... बहुत अच्छा, शाबाश!" लिखकर कमेंट और लाइक का ऐसा छक्का-चौका मारता है कि पूरा कमेंट सेक्शन ब्लॉक करके ही दम लेता है।

व्हाट्सऐप स्टेटस पर एकाधिकार : 

जिसको आप कभी फूटे आँख नहीं सुहाते थे, वो अब आपकी डीपी चुराकर और बारंबार फ़ोन करके आपसे फोटो माँग-माँगकर अपने स्टेटस में चिपका देता है। फिर सबको स्टेटस दिखा-दिखाकर छाती ठोकता है— "इ हमरे बिल्कुल ख़ास हैं! हमरे फूफा के चाचा के भाई के चाची के लड़के हैं... दूर के रिश्तेदार हैं, पर अपने तो अपने ही होते हैं न!"

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निष्कर्ष: समीकरण का अंतिम सत्य

संसार का यह 'सामाजिक गणित' बिल्कुल स्पष्ट है—जब तक आप ज़मीन पर पड़े 'सुतली बम' हैं, लोग आपसे दूरी बनाकर रखेंगे कि कहीं फटने से धुआँ न हो जाए। पर जैसे ही आप सफलता के 'रॉकेट' बनकर आसमान में चमकेंगे, वही लोग आपके पीछे 'दीवाली मनाने' दौड़ पड़ेंगे। 

​ प्रसिद्धि का यह समीकरण न कभी बदला था, न बदलेगा। बस इतना ध्यान रखिए कि जब आप 'तारा जैसन टमकने' लगें, तो पंगत में काजू-बादाम परोसने वालों के सेल्फी-कैमरे से थोड़ा बचकर रहिएगा!

पाठकीय संवाद (अपनी राय ज़रूर दें):

​क्या आपके जीवन में भी ऐसे 'लटजीरा' रिश्तेदारों और मित्रों का आगमन 'रॉकेट' बनने के बाद हुआ है? या आप भी किसी का व्हाट्सएप स्टेटस देखकर मुस्कुरा रहे हैं? अपनी राय और अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें!





— देवांश

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