राखी-केवल रेशम की डोर ही नहीं एक अटूट बंधन है।

राखी-केवल रेशम की डोर ही नहीं एक अटूट बंधन है।

भारत भूमि उत्सवो,त्योहारों व पर्वों की भूमि है।अनमोल व पावन पर्वों में से एक रक्षाबंधन,साधारणतःराखी कही जानेवाली रेशम की या कच्चे धागे से बनी वह
डोर ही केवल नहीं है जिसे बस प्रदर्शन मात्र के लिए 
बाँध या बँधवा लिया जाता है,अपितु यह भाई-बहन के उस विश्वास का प्रतीक है जिसके आधार पर आज भी यह लोक आस्था इस संसार में शेष है कि हर वो भाई-बहन जो इस रक्षासूत्र को बाँधता-बँधवाता है काल भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाता है।

Rakhi-kewal dor hi nhi ek atoot bandhan hai


कहानी रक्षासूत्र की

पौराणिक प्रसंग के अनुसार एक  बार देवासुर संग्राम में देवराज इन्द्र का सामना दैत्यराज बलि से होना सुनिश्चित हुआ था,तो उनकी पत्नी देवी शचि ने ब्राह्णों द्वारा यज्ञ कराकर इस रक्षासूत्र को देवराज इन्द्र के दाहिने कलाई पर बाँधा था,इस रक्षासूत्र के प्रभावस्वरूप राजा बलि पराजित और देवराज सकुशल विजयी हुए,अमरावती में जब अन्य देवताओं ने  
उन्हें सकुशल देखा तो सभी ने इस रक्षासूत्र की महिमा
 जानकर एक-दूसरे को युद्ध में जाने से पहले इसे बाँधना
 शुरु कर दिया।
  पहले तो यह केवल रक्षासूत्र के नाम से प्रसिद्ध था,जिसे       किसी के भी कलाई में बाँधा जा सकता था।


द्रौपदी ने  श्रीकृष्ण की उंगली कटने पर फाड़ा जब साड़ी का पल्लू

एक पौराणिक प्रसंग के अनुसार जब श्रीकृष्ण शिशुपाल का वध कर रहे थे,तो उस समय किसी तरह उनके सुदर्शन चक्र के तेज धार से उनकी उँगली कट गयी और उससे बहुत अधिक खून बहने लगा,यह देखकर वहाँ उपस्थित द्रौपदी से रहा नहीं गया और उसने अपने साड़ी के पल्लू को फाड़कर उनकी उँगली में बाँध दिया,इस घटना से द्रवित हो। श्रीकृष्ण ने उन्हें यह कहते हुए तत्क्षण  वचन दिया कि आज से और अभी से तुम मेरी बहन हो और तुम्हें जब भी मुसीबत में,किसी परेशानी में मेरी आवश्यकता होगी तुम्हारी एक पुकार पर मैं वहाँ  सहायतार्थ,रक्षार्थ उपस्थित रहुँगा।
 उन्होंने इस वचन को अन्त तक निभाया भी,जब द्युत   क्रीडा में शकुनि ने पाण्डवों को छल से हरा दिया तो     दुशासन उसे बाल से खींचता हुआ सभा में ले आया
  जहाँ समस्त सभा और पाण्डवों ने द्रौपदी का मान-हनन होता देख भी  उसकी सहायता करने में असमर्थता जताई,तब एकमात्र सहारा श्रीकृष्ण को मान,ज्योंही उसने 
 उन्हें आर्त हृदय से पुकारा। 
भक्त वत्सल श्रीकृष्ण ने तुरन्त वहाँ आकर उसकी लाज बचा ली।

 Arjunah uvachah-Neta bnna aasan magar shikshak muskil
जब लक्ष्मीजी ने राजा बलि को बाँधा रक्षासूत्र

एक बार जब दैत्यराज राजा बलि समस्त लोकों  पर अधिकार करने के लिऐ दैत्यगुरु शुक्राचार्य के सान्निध्य में समस्त देवताओं को पराजित करने के लिए यज्ञ,अनुष्ठान आदि करवा रहे थे,तब समस्त देवगण यह सूचना प्राप्त करते ही भगवान विष्णु के समक्ष विकट परिस्थिति के बारे में समझाने-बतलाने उपस्थित हो गए।
भगवान ने समस्या की विकटता को जान स्वयं वस्तुस्थिति के परीक्षण का निर्णय कर महाबलिपुरम
 जाने का निश्चय किया।
दानवीर बलि के समक्ष भगवान वामनावतार में प्रकटे,वामन के वास्तविकता को पहचान दैत्यगुरु शुक्राचार्य ने राजा बलि को समझाया कि ये वामन स्वयं ही श्रीहरि विष्णु हैं,पर फिर भी दानवीर ने अपने दान के संकल्प को पूरा करते हुए वामनावतार भगवान को तीन पग भूमि दान कर ही दी,जिसके फलस्वरूप भगवान ने अपने  दो पगों में धरती और आकाश तथा तीसरे पग में स्वयं सम्पूर्ण राजा बलि को ग्रहण कर लिया।
 उसकी दानवीरता से प्रसन्न हो जब भगवान ने उसे वर माँगने को कहा,तो उसने अपने राज्य के मुख्य द्वार का प्रहरी बनने का निवेदन श्रीभगवान से कर दिया,जिसे भक्तवत्सल अस्वीकार कर ही नहीं पाए।
कई दिनों तक नारायण श्रीसागर नहीं पहुँचे तो उनके विषय में चिन्तित होकर लक्ष्मी जी ने नारद जी से अपनी सारी व्यथा जब कह सुनाई,तो नारद जी ने उनसे कहा
 कि वे राजा बलि को जाकर रक्षासूत्र बाँधें और उनसे   उपहार स्वरूप भगवान विष्णु को प्राप्त कर लें,इस प्रकार   ही नारायण राजा बलि जैसे भक्त के स्नेह-बंधन से मुक्त   हो पाएंगे।
 जिस दिन लक्ष्मी जी ने राजा बलि को रक्षासूत्र बाँधा था,उस दिन श्रावण मास की पूर्णिमा तीथि थी।
 

सिकंदर महान की पत्नी को भी पोरस से उसकी रक्षा के लिए बाँधना पड़ा था रक्षासूत्र


भारत शूर-वीरों की भूमि है।इस भूमि ने एक से बढ़कर  एक वीर यहाँ पैदा किये हैं ,जिसने इस भूमि की गरिमा बढ़ाई है।बाह्य आक्रमणकारियों ने यहाँ जितना अधिक
अधिकार जमाने का प्रयत्न किया,उतनी असफलता ही उनके हाथ लगी ।
उन्होंने जितना अधिक हमें दुर्बल समझा,उतनी ही सबलता का परिचय हमने दिया है।
  साथ ही आवश्यकता पड़ने पर उन्हें भरपूर सम्मान व सहायता देने में भी हमने कमी नहीं की है।
सिकंदर महान पोरस अर्थात् पुरु राजवंश के राजा पुरु को 
दुर्बल समझकर उनपर आक्रमण किया,तब पूर्ण सबलता का परिचय जब राजा पुरु ने दिया,तो उसकी पत्नी रोक्जाना ने अपने पति के प्राण बचाने के लिए उन्हें रक्षासूत्र बाँधा।

रक्षासूत्र मानवता को परिभाषित करने वाला बंधन-
गुरुदेव  रवीन्द्रनाथ ठाकुर


गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने अँग्रेज़ों की फूट डालो और शासन करो की नीति के लिए मुँहतोड़ जवाब के रूप में समस्त विश्व को रक्षासूत्र में बाँधने का आह्वान किया।
 १६ अक्टूबर १९०५ ई० को स्नान आदि  से निवृत होकर समस्त लोगों को प्रदर्शन करने का आह्वान किया,इस आह्वान का उद्देश्य यह था कि समस्त विश्व को एकसूत्र में बाँधा जाए और धर्म-सम्प्रदाय में भी कोई मतभेद नहीं 

समसामयिक स्थिति में रक्षासूत्र के बदले विशेष उपहार के लिए बहनों का आह्वान

पुरातन काल में सुविधाओं का अभाव था, मानवता का नहीं।उस काल मे़्ं केवल प्रेम ही प्रेम हर ओर झलखता था,समुचित मर्यादा का विरले ही लोप दिखाई पड़ता था।यदि मर्यादा पर उस काल में कोई विघ्न उत्पन्न होता था, तो उसके लिए भयभीत करने वाले ऐसे दण्ड विधान की व्यवस्था होती थी जिसके भय से वो भूलवश भी वैसे जघन्य अपराध नहीं करते थे।
पर ,आज की स्थिति बड़ी ही विपरीत है आज अपराध व अपराधी दोनों को इतनी सुविधा प्राप्त है कि दण्ड का भय अंशमात्र भी नहीं दिखता।
 ऐसी स्थिति में स्वयं की सुरक्षा केवल अपनी उत्तरदायित्व ही रह जाती है ।
अत: बहनों के प्रति होने वाले अनाचार, जघन्य अपराध के लिए उन्हें स्वयं की रक्षा स्वयं करनी होगी।
इस हेतु बहनों के लिए किस विशेष उपहार की आवश्यकता पड़ेगी, उसी को बताने का प्रयत्न मैंने किया है,कृपा कर पूरा पढ़ने के बाद समर्थन व असमर्थन  स्वरूपी प्रतिक्रिया अवश्य रखें।

सुनो बहन तुम राखी बाँधो, बन्दूक एक मैं देता हूँ।
गद्दारों को गोली मारो,ये छूट अभी से देता हूँ।।

नहीं डरेगी बेटी बहना,सुन सबको ये बतलाना है।
डरने की है बारी उनकी,चल उनको ये जतलाना है।।

सीमा पर तैनात अभी हूँ,यहाँ रक्षा सबकी करनी है।
डरी हुई थी जो भी अबतक,अब हिम्मत उनमें भरनी है।।

दिखे अगर जो कहीं दुशासन,बस छलनी-छलनी करना है।
क्यों किसी से हमें है डरना,जब यहाँ सभी को मरना है।।

शोक नहीं अब कभी मनाओ,बस शौक यही अपना लेना।
पास अगर वो भूले आए,केवल बन्दूक दिखा देना।।

कभी हाथ जो आकर पकड़े,तब उसको धूल चटानी है।
लहू बहाकर उसका तुमको, धरती को यहाँ पटानी है।।

भारत भूषण पाठक'देवांश'🙏🌹🙏
कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न
प्रश्न १:-भद्रा कितने घंटे की मानी जाती है ?
उत्तर-भद्रा की समय अवधि ७ घंटे से १३ घंटे २० मिनट तक मानी जाती है ।
प्रश्न २:-भद्रा काल को परिभाषित करें ?
उत्तर-शुक्ल पक्ष की अष्टमी तथा पूर्णिमा की तिथि के पहले भाग को विद्वत समाज द्वारा भद्रा की संज्ञा दी जाती है।
प्रश्न ३:-भद्रा सीधे-सीधे सूर्य और शनि से क्या संबंधित होती है?
उत्तर-हाँ भद्रा का सीधा संबंध सूर्य और शनि से होता है।

प्रश्न ४:-दाहिनी कलाई में ही रक्षासूत्र क्यों बाँधी जाती है ?
उत्तर-दाहिनी कलाई में ही रक्षासूत्र बाँधने-बँधवाने से कार्यक्षमता और जीवन शक्ति की वृद्धि होती है।

प्रश्न ६:-नाड़ी शास्त्र के अनुसार हमारे शरीर में कौन-कौन सी नाड़ियाँ होती हैं तथा उसके काम क्या-क्या हैं ?
उत्तर-मानव शरीर में नाड़ी शास्त्र के अनुसार तीन प्रकार की नाड़ियाँ होती हैं-पिंगला,सुषुम्ना और इड़ा।
पिंगला के कार्य-पिंगला शरीर में धनात्मक ऊर्जा का संचार करती है,इसे सूर्यनाड़ी भी कहा जाता है।
सुषुम्ना के कार्य-यह शरीर की एक नियंत्रण इकाई के रूप में कार्य करती है।
इड़ा के कार्य-यह शरीर में प्रेम और संवेदना का नियंत्रक है।
प्रश्न ७ :-भद्रा काल में रक्षासूत्र क्यों नहीं बाँधना चाहिए ?

उत्तर-  प्राचीन मान्यता के कारण रक्षासूत्र इस काल में               इसलिए नहीं बाँधना चाहिए क्योंकि इसी काल
         में रावण को शूर्पणखा ने रक्षासूत्र बाँधा था और            उसका समूल विनाश हो गया।     

प्रश्न ८:-रक्षाबंधन को नारियल पूर्णिमा के रूप में कहाँ जाना जाता है ?
उत्तर- इसे महाराष्ट्र में नारियल पूर्णिमा के रूप में जाना जाता है।

प्रश्न ९:-रक्षाबंधन के दिन व उससे एक दिन पहले कहाँ व किसे मुफ्त बस सेवा  प्रदान करती है ?
उत्तर-रक्षाबंधन के दिन व उससे एक दिन पहले हरियाणा में राज्य रक्षाबंधन के दिन व उससे एक दिन पहले महिलाओं के साथ-साथ अठारह  साल या उससे कम आयु के पुरुष को मुफ्त बस सेवा प्रदान करती है।

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