मर्मज्ञाता प्रेमचन्द-वेदनाओं के विशेषज्ञ

 आज एक ऐसे महामानव के बारे में आपको बताऊंगा जो  मर्मज्ञाता था,जी हाँ मैं मर्मज्ञाता प्रेमचन्द की बात कर रहा हूँ । 

Marmagyaata premchand vednaon ke visheshagya

 प्रेमचंद कलम के जादूगर थे,पर कैसे क्या आप जानते हैं ?

चलिए इसे मैं आपको समझाने का प्रयत्न करता हूँ क्योंकि वो सभी प्राणियों के वेदनाओं के विशेषज्ञ थे।

सामाजिक कुरीतियों,वेदनाओं का दर्शन

१८८० ई० वाराणसी के निकट लमही गाँव में जन्मे इस महान कहानीकार,उपन्यासकार की प्रत्येक रचनाओं में सामाजिक कुरीतियों,वेदनाओं का दर्शन होता है। 

धनपतराय नवाबराय प्रेमचंद का सम्पूर्ण जीवन अभावों में ही बीता और सम्भवतः इन्हीं अभावों ने सामान्य प्रेमचंद को कलम का जादूगर बना दिया।

आस-पास घटित घटनाओं ने,तत्कालीन समाज में फैली कुरीतियों ने उनके लेखनी को इन वेदनाओं ने ऐसा भिंगोया कि सभी वेदनाएं,समाज की कुरीतियाँ,पीड़ाएँ लेखनी से प्रस्तुत हो अपनी सम्पूर्ण कहानियाँ सुनाने लगीं।

जातीय भेदभाव को दर्शाने का प्रयत्न सार्थक

होरी के अभावग्रस्त जीवन का वर्णन,पंडित दातादीन के गो-दान प्राप्ति की चेष्टा,गोबर का प्रेम व धनियाँ के गो-दान को रोकने की चेष्टा का वर्णन,पड़ोसियों से गाय को छुपाने का अद्भुत वर्णन भोला दूधवाले का मित्रतावश होरी को गाय देना गोदान की ये अद्भुत चित्रांकन क्या कहीं ओर मिलता है।

इसके साथ ही साथ राय साहब के यहाँ होने वाले रामलीला के नाटकीय मंचन में होरी को राजा जनक के माली का किरदार देना तत्कालीन परिवेश में जातीय भेदभाव को दर्शाने का प्रेमचंद जी का प्रयत्न अत्यंत सार्थक है।

मुंशी प्रेमचन्द जी के अमर कृतित्वों में कर्मभूमि उपन्यास स्वातन्त्रय समर का ऐसा अद्भुत चित्रांकन है कि इसे पढ़नेवाला स्वयं को स्वातन्त्रय समर के बीचों-बीच प्रस्तुत मानता है।

सर्वोच्चता सिद्धि के समय मर्मज्ञाता प्रेमचन्द कर्मभूमि के पात्रों का जीवंत चित्रण करने में व्यस्त

जब सम्पूर्ण साहित्य जगत अपनी सर्वोच्चता सिद्धि में लगा था,तो यह कलम का जादूगर प्रेमचन्द,मर्मज्ञाता प्रेमचन्द कर्मभूमि के लाला समरकान्त,लाला अमरकान्त,सुखदा,नैना,रेणुका देवी इत्यादि जैसे पात्रों का जीवंत चित्रण करने में व्यस्त थे।

कर्मभूमि का संक्षिप्त दर्शन

उपन्यास के प्रारम्भ में तत्कालीन विद्यालयों-महाविद्यालयों का दर्शन कराने के प्रयत्न में मुंशी प्रेमचन्द जी ने यह बताया है कि उस समय विद्यालय-महाविद्यालय शुल्क जिस तल्लीनता से प्राप्ति का अभियान चलता था,उतनी तल्लीनता से सामानों पर लगने वाला कर भी प्राप्ति का प्रबंध नहीं होता था,इस बात को दर्शाता है कि उस समय मनमाने शुल्क  प्राप्ति का अभियान चलाया जाता था,जो सक्षम होते थे वो पढ़ पाते थे।शेष के लिए कोई विकल्प ही शेष नहीं रहता था।
उसके पश्चात लाला समरकान्त द्वारा अपने पुत्र अमरकांत को 
अपने कारोबार से जोड़ने के लिए यह कहना कि तुम्हें किस बात की कमी है,अच्छा-भला कारोबार है फिर भी यह सिरफिरों जैसी आज़ादी के आन्दोलन में जाने की जिद।
क्या कष्ट है इस गुलामी में तुमको,अरे भई! ये गुलामी तो नीचले तबके के लोगों के लिए कष्टकर है प्रेमचंद द्वारा यह लिखना उस समय धनाढ्य परिवारों की ओछी मानसिकता दर्शाने का ऐसा जीवंत चित्रण है जो इस उपन्यास को जीवंत कर देती है।
पर पुनः अन्त में लाला समरकान्त का अमरकान्त की भाँति आज़ादी के आन्दोलन में कूद पड़ने का जीवंत चित्रांकन स्वतंत्रता संघर्षों की अद्भुत दृश्यांकन है।
 
ठाकुर का कुआँ
उनके द्वारा रचित इस कृति में ज़मींदारों द्वारा निम्न वर्ग पर किए अत्याचारों का ऐसा चित्रांकन है कि जिसके बारे में पढ़ने-जानने के पश्चात मन यह विचार करने को विवश हो जाता है मानव-मानव की ऐसी शत्रुता।
ज़मींदारों के यहाँ काम न करने से निम्नवर्गीय लोगों के कुएँ में मरे भैंस का जान-बूझकर फेंकना उस ओछी मानसिकता का परिचायक है जिसे इस जादूगर ने शत् प्रतिशत  चित्रांकन किया है।

निर्मला
प्रेमचन्द जी द्वारा रचित एक और उपन्यास निर्मला तत्कालीन समाज में फैले दहेजप्रथा व मध्यवर्गीय विवशता को दर्शाता है जहाँ 'निर्मला' उपन्यास के मुख्य पात्र की बाल्यावस्था की हँसी -ठिठोली का अन्त इस दहेजरूपी दानव के कारण होने का और मध्यवर्गीय विवशता का चित्रण करते हुए प्रेमचंद ने दर्शाया है कि दहेजलोभी समाज के समक्ष विकल्प न होने की स्थिति में बालिका निर्मला का विवाह अधेड़ उम्र के एक व्यक्ति से होने को दर्शाते  हुए प्रेमचंद जी ने तत्कालीन समाज का मार्मिक व विचारनीय वर्णन किया है।


दो बैलों की कथा के माध्यम से समाज को नैतिक व प्रेरक सन्देश

दो बैलों की कथा में प्रेमचन्द द्वारा गधे को मूर्ख की जगह सहिष्णु प्राणी दर्शाना उनका मूक प्राणियों के प्रति जहाँ करुणा को दर्शाता  है,वहीं बैलोंको गया के बेटी द्वारा रोटी खिलाने पर
गया को मोती द्वारा सींघ मारने की पेशकश पर यह कहना कि बच्ची अनाथ हो जाएगी उनके पशु होने के पश्चात भी उच्च कोटीय सोच को दर्शाता है।
साथ ही उनके द्वारा यह कहना कि और जात पर सींघ चलाना मना है प्रेमचन्द द्वारा बैलों के माध्यम से समाज को एक नैतिक व प्रेरक सन्देश यह दिया जा रहा है कि नारी अपमान व तिरस्कार नहीं,अपितु सम्मान की पात्रा है।
बैलों के उपरोक्त कथन मानवता पर पाशविकता यानि पशु होते हुए भी मानवीय सोच को दर्शाता है। 

पंच-परमेश्वर
मुंशी प्रेमचन्द जी द्वारा रचित यह कहानी समाज को एक प्रेरक सन्देश यह देती है कि न्याय के समक्ष सभी कोई समान ही हैं।
चाहे कोई अमीर हो या गरीब,छोटा हो या बड़ा,अपना हो या पराया।
पंच-परमेश्वर में खाला की ज़मीन के फैसले पर किस प्रकार दो पक्के मित्रों जुम्मन शेख़ और अलगू चौधरी में बहस चिढ़ती है और किस प्रकार पंच-परमेश्वर के पद पर आसीन अलगू चौधरी ने मित्र होते हुए भी खाला के समर्थन में फैसला सुनाकर पंच-परमेश्वर के पद की गरिमा बनाई रखी यह अनमोल कहानी हमें न्यायप्रिय होने की प्रेरणा देती है।
सारांश में प्रेमचन्द जी द्वारा रचित अनेकों अमर कृतियों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि प्रेमचन्द जी वेदनाओं के विशेषज्ञ थे और ऐसे महामानव को मेरा भी शत्! शत् ! नमन

कुछ आवश्यक प्रश्न
१.आलेख से क्या समझते हैं ?
उत्तर- आलेख सीमित शब्दों में वर्णित वह लेख है जिसे पढ़कर सम्पूर्ण विषयवस्तु पूर्णतः स्पष्ट हो जाती है।
२.व्यंग्य आलेख किसे कहते हैं ?
उत्तर -आलेख लेखन की वह विधा जिसमें विषयवस्तु पर व्यंग्य प्रस्तुत करते हुए उसकी सार्थकता को स्पष्ट करने के लिए समुचित तथ्य प्रस्तुत किए जाते हैं।
३. व्यंग्य आलेख की भाषाशैली किस प्रकार की होनी चाहिए ?
उत्तर- इसकी भाषाशैली सुस्पष्ट होनी चाहिए,व्यंग्य आलेखों में विषयवस्तु पर कटाक्ष किए जाते हैं,पर उन कटाक्षों का,तीक्ष्ण शब्द प्रयोगों का मूल उद्देश्य विषयवस्तु की सार्थकता अथवा निरर्थकता का स्पष्टीकरण है।
४. टिप्पणी से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-टिप्पणी से हमारा अभिप्राय विषयवस्तु पर अपनी मनोनुकूल प्रतिक्रिया देना है।
परन्तु यह टिप्पणियाँ कम से कम एक वाक्य की होनी ही चाहिए।
५.प्रतिक्रियाओं से क्या आशय है ?
उत्तर-मनोभावों से अभिप्रेरित वह क्रिया जिसके फलस्वरूप व्यक्ति अपने विचार प्रस्तुत करता है ।
६.समीक्षात्मक टिप्पणी किसे कहते हैं तथा इसके अनिवार्य तत्व क्या हो सकते हैं ?
उत्तर-समीक्षात्मक टिप्पणी का आशय विषयवस्तु की समीक्षा अर्थात उसमें हुई त्रुटियों को इंगित करते हुए उचित मार्गदर्शन करना होता है।
इसके अनिवार्य तत्वों में व्याकरणिक तथ्यों की स्पष्टता,समुचित भाव-प्रवाह तथा उचित शब्द प्रतीकों के चयन मेरे अनुसार हो सकते हैं।
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