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संघर्षों की पाठशाला जीवन

संघर्षों की पाठशाला है यह जीवन

संघर्षों की पाठशाला है यह जीवन,बुद्धिजीवियों द्वारा यह माना जाता है,यहाँ प्राप्त होने वाले प्रत्येक सुख के पीछे एकमात्र सिद्धांत बस यही है कि जिसने जितना अधिक संघर्ष किया है,वह उतना ही अधिक योग्य होता गया है।

Sangarshon ki paathsaala hai yah jeevan.
 

कर्म मार्ग का चयन करना ही श्रेयस्कर

प्रगतिवादी इस युग में बढ़ते रहना ही हमारा ध्येय है,परन्तु हमने बढ़ने के लिए लघु मार्गों का चयन किया है।
हमें बढ़ते तो रहना है मगर यत्नपूर्वक।
यह बिल्कुल उचित नहीं है,क्योंकि कर्तव्य पथ पर हमें अग्रसर तो होना है।मगर कर्म मार्ग का चयन करना ही श्रेयस्कर है।कर्मों का चयन कर आगे बढ़ने से सफलता के मार्ग में कोई बाधा उत्पन्न नहीं होती है।
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हार-जीत सिक्के के दो पहलू

जीवन संघर्षों की एक पाठशाला है जिसने जितना अध्ययन किया,वो उतना ही आगे बढ़ता रहा
हार -जीत तो एक सिक्के के दो पहलू हैं,जो किसी भी परिस्थिति में प्रत्यक्ष होंगे ही।
बिना इनसे प्रत्यक्ष हुए आगे बढ़ना संभव नहीं।

संघर्षरत संतति ही सर्वोच्चता को प्राप्त

डार्विन के विकासवादी सिद्धांत की व्याख्या भी तो यही है कि वह संतति जो सदैव जीवन युद्ध में संघर्षरत रहता है,वही जीवन संघर्ष में सर्वोच्चता को प्राप्त करता है।
यहाँ अकर्मण्यों के लिए कोई स्थान नहीं है,जो व्यर्थ ही बैठे रहते हैं और बिना यत्न किए सब कुछ प्राप्त करना चाहते हैं,उनके लिए कुछ भी प्राप्त नहीं है,संघर्षों की मापदण्ड यही है कि जीव को स्वर्णसम स्वयं को तपाना पड़ता है।


  इसी विषय वस्तु को समझाने का तुच्छ प्रयत्न मैंने आज संयुक्ता छंद में किया है,संयुक्ता छंद एक वार्णिक छंद है ,जिसका विधान तथा गणावली व मापनी निम्नलिखित है:-
गणावली--
सलगा जभान जभान गा
(१० वर्ण) प्रति चरण।
११२    १२१    १२१  २ 

बढ़ते रहो तुम राह में ।

कुछ प्राप्त हो इस चाह में।।
 
श्रम पे टिका हर मार्ग है।

यहाँ श्रेष्ठ कर्म सुमार्ग है।।१
 

सुन जीत है मिलती उसे।

मन जीत की रहती जिसे।।

नहि व्यर्थ हो सुन वक्त जी।
 
बन ले व्रती तुम शक्त जी।।२


मत हार मान कभी यहाँ।

बस बैठ रत्न मिले कहाँ।।

हम सीख लें कर साधना।
 
कर कर्म की हम नाधना।।३

कर ध्यान तू इस बात का।

बस आ रहे उस प्रात का।।
 
वरदान ये हमको मिले।

हर लें सभी शिकवे-गिले।।४

भारत भूषण पाठक'देवांश'🙏🌹🙏

काव्य का सारांश
मेरे द्वारा रचित काव्य का सारांश यही है कि हमें अभीष्ट की प्राप्ति तक गतिशील रहना चाहिए।
प्रत्येक अभीष्ट की सिद्धि के पीछे मात्र हमारे द्वारा किए गए सार्थक प्रयत्न व सत्कर्म ही हैं।
विजयश्री प्राप्ति हेतु विजित होने का भाव समाहित होना अत्यावश्यक है।
व्यर्थ समय नष्ट करने से श्रेयस्कर अभीष्ट प्राप्ति के साधनों के उपाय करने ही हैं।
मोती को प्राप्त करने के लिए जलधि के अंतस को खँगालना अनिवार्य होता है।


१.क्या छंदबद्ध रचनाएं अधिक पठनीय होती हैं?
उत्तर-छंदबद्ध रचनाएं काव्य में प्राण फूंक देती हैं।
इससे काव्य में गेयता आ जाती है।

२.क्या छंद को सीखने में कठिनाई आती है?
उत्तर-छंद एक साधना है।किसी भी साधना में समय तो लगता ही है और साधना जब सरल हो तो साधना क्या !

३.छंद को सीखने में सुगमता कब होती है?
 उत्तर-जब छंद के विधान व मात्राभार से आप परिचित हो जाते हैं तो इसे सीखने में सुगमता होती है।
४. क्या प्राचीनतम छंद फिल्मी गानों में प्रयोग किए गए हैं?
 उत्तर-जी प्रत्येक छंदों का प्रयोग किसी ना किसी गाने में हुआ है,उदाहरणार्थ-मुहब्बत एक तिजारत बन गयी है सुमेरु छंद पर आधारित है।
साथ ही श्रीराम चंद्र कृपालु भजु मन भजन उडियाना छंद में है।
५ .क्या वार्णिक छंद व मात्रिक छंद में कुछ भिन्नता है?
उत्तर-बिल्कुल कुछ छंद वर्णों यानि अक्षरों पर आधारित हैं तो कुछ मात्राओं के आधार पर लिखे जाते हैं।

६ .वार्णिक व मात्रिक छंदों के कुछ उदाहरण रखें?
उत्तर-माता शब्द में दो वर्ण हैं तथा मात्राएं चार हैं।

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