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वो धरतीपुत्र

 वो धरतीपुत्र

वो धरतीपुत्र हमें भोजन उपलब्ध कराने के लिए खेती करता है।


वह अपने  हल से हमारे भूख का हल सदैव निकाल लेता  है।
Wo dhartiputra

भोजन उपलब्धकर्ता धरतीपुत्र

कहना ये गलत ना होगा कि वो धरतीपुत्र  प्रातः हल लेकर खेतों में पहुँच जाता है।
कल्पना करें कि यदि वो भोजन उपलब्धकर्ता धरतीपुत्र कृषि कार्य न करे तो हमें भोजन कैसे प्राप्त हो पाता।

कृषि प्रधान देश भारत 

भारत एक कृषि प्रधान देश है।इसकी जनसंख्या की लगभग ८०%जनसंख्या गाँवों में रहती है।
उनके गाँवों में रहने के कारण ही हमारी क्षुधा की तृप्ति हो पाती है,उनके इसी तप के प्रतिफलस्वरूप हम आज आनंद में हैं।
उनके इस त्याग,इस समर्पण के फलस्वरूप उन्हें सरकारी सुविधा मिलनी आवश्यक है जो आज कुछ सीमा तक दृष्टिगोचर भी है।
बस उन्हीं की दशा और दिशा को ध्यान में रख इस चौपाई छंद को मैंने सृजन किया है,आशा है आप सबों को अवश्यमेव पसन्द आएगी और आपकी पसन्दात्मक प्रतिक्रिया भी अवश्य प्राप्त होगी ऐसी कामना करता हूँ ।

चौपाई छंद विधान-चौपाई 16 मात्रा का बहुत ही व्यापक छंद है। यह चार चरणों का सम मात्रिक छंद है। चौपाई के दो चरण अर्द्धाली या पद कहलाते हैं। जैसे-

“जय हनुमान ज्ञान गुण सागर। जय कपीश तिहुँ लोक उजागर।।”

ऐसी चालीस अर्द्धाली की रचना चालीसा के नाम से प्रसिद्ध है। इसके एक चरण में आठ से सोलह वर्ण तक हो सकते हैं, पर मात्राएँ 16 से न्यूनाधिक नहीं हो सकती। दो दो चरण समतुकांत होते हैं। चरणान्त गुरु या दो लघु से होना आवश्यक है।

चौपाई छंद चौकल और अठकल के मेल से बनती है। चार चौकल, दो अठकल या एक अठकल और दो चौकल किसी भी क्रम में हो सकते हैं। समस्त संभावनाएँ निम्न हैं।
4-4-4-4, 8-8, 4-4-8, 4-8-4, 8-4-4

चौपाई में कल निर्वहन केवल चतुष्कल और अठकल से होता है। अतः एकल या त्रिकल का प्रयोग करें तो उसके तुरन्त बाद विषम कल शब्द रख समकल बना लें। जैसे 3+3 या 3+1 इत्यादि। चौकल और अठकल के नियम निम्न प्रकार हैं जिनका पालन अत्यंत आवश्यक है।

चौकल = 4 – चौकल में चारों रूप (11 11, 11 2, 2 11, 22) मान्य रहते हैं।

(1) चौकल में पूरित जगण (121) शब्द, जैसे विचार महान उपाय आदि नहीं आ सकते।
(2) चौकल की प्रथम मात्रा पर कभी भी शब्द समाप्त नहीं हो सकता।
चौकल में 3+1 मान्य है परन्तु 1+3 मान्य नहीं है। जैसे ‘व्यर्थ न’ ‘डरो न’ आदि मान्य हैं। ‘डरो न’ पर ध्यान चाहूँगा, 121 होते हुए भी मान्य है क्योंकि यह पूरित जगण नहीं है। डरो और न दो अलग अलग शब्द हैं। वहीं चौकल में ‘न डरो’ मान्य नहीं है क्योंकि न शब्द चौकल की प्रथम मात्रा पर समाप्त हो रहा है।

3+1 रूप खंडित-चौकल कहलाता है जो चरण के आदि या मध्य में तो मान्य है पर अंत में मान्य नहीं है। ‘डरे न कोई’ से चरण का अंत हो सकता है ‘कोई डरे न’ से नहीं।

अठकल = 8 – अठकल के दो रूप हैं। प्रथम 4+4 अर्थात दो चौकल। दूसरा 3+3+2 है जिसमें त्रिकल के तीनों (111, 12 और 21) तथा द्विकल के दोनों रूप (11 और 2) मान्य हैं।

(1) अठकल की 1 से 4 मात्रा पर और 5 से 8 मात्रा पर पूरित जगण – ‘उपाय’ ‘सदैव ‘प्रकार’ जैसा शब्द नहीं आ सकता।
(2) अठकल की प्रथम और पंचम मात्रा पर शब्द कभी भी समाप्त नहीं हो सकता। ‘राम नाम जप’ सही है जबकि ‘जप राम नाम’ गलत है क्योंकि राम शब्द पंचम मात्रा पर समाप्त हो रहा है।

पूरित जगण अठकल की तीसरी या चौथी मात्रा से ही प्रारंभ हो सकता है क्योंकि 1 और 5 से वर्जित है तथा दूसरी मात्रा से प्रारंभ होने का प्रश्न ही नहीं है, कारण कि प्रथम मात्रा पर शब्द समाप्त नहीं हो सकता। ‘तुम सदैव बढ़’ में जगण तीसरी मात्रा से प्रारंभ हो कर ‘तुम स’ और ‘दैव’ ये दो त्रिकल तथा ‘बढ़’ द्विकल बना रहा है।
‘राम सहाय न’ में जगण चौथी मात्रा से प्रारंभ हो कर ‘राम स’ और ‘हाय न’ के रूप में दो खंडित चौकल बना रहा है।


हल लेकर वो घर से निकला।

सुबह-सवेरे चला अकेला।।

भोजन करना भी वो भूला।

फसल उगाने को है तूला।।१

नहीं उसे है अपनी चिन्ता।
सोचा देगा हमें नियंता।।
हल संग अरु बैल की जोड़ी।
फटी हुई है उसकी एड़ी।।२

धरतीपुत्र भी वो कहाए।
उसको श्रम है सदा सुहाए।।
जोत जोत कर वो है धरती।
उर्वर बना रहा है परती।।३

नहीं दशा है उसकी अच्छी।
शासन से वो कहता सच्ची।।
ध्यान ज़रा दो उनपर थोड़ा।
मुँह जो तुमने उनसे मोड़ा।।४

भारत भूषण पाठक'देवांश'🙏🌹🙏




१.क्या छंदबद्ध रचनाएं अधिक पठनीय होती हैं?
उत्तर-छंदबद्ध रचनाएं काव्य में प्राण फूंक देती हैं।
इससे काव्य में गेयता आ जाती है।

२.क्या छंद को सीखने में कठिनाई आती है?
उत्तर-छंद एक साधना है।किसी भी साधना में समय तो लगता ही है और साधना जब सरल हो तो साधना क्या !

३.छंद को सीखने में सुगमता कब होती है?
 उत्तर-जब छंद के विधान व मात्राभार से आप परिचित हो जाते हैं तो इसे सीखने में सुगमता होती है।
४. क्या प्राचीनतम छंद फिल्मी गानों में प्रयोग किए गए हैं?
 उत्तर-जी प्रत्येक छंदों का प्रयोग किसी ना किसी गाने में हुआ है,उदाहरणार्थ-मुहब्बत एक तिजारत बन गयी है सुमेरु छंद पर आधारित है।
साथ ही श्रीराम चंद्र कृपालु भजु मन भजन उडियाना छंद में है।
५ .क्या वार्णिक छंद व मात्रिक छंद में कुछ भिन्नता है?
उत्तर-बिल्कुल कुछ छंद वर्णों यानि अक्षरों पर आधारित हैं तो कुछ मात्राओं के आधार पर लिखे जाते हैं।

६ .वार्णिक व मात्रिक छंदों के कुछ उदाहरण रखें?
उत्तर-माता शब्द में दो वर्ण हैं तथा मात्राएं चार हैं।

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